सोम प्रदोष व्रत आज
भोपाल [ महा मीडिया] 10 अगस्त 2026 को सावन मास के कृष्ण पक्ष का सोम प्रदोष व्रत है। सावन महीने में सोमवार के दिन प्रदोष व्रत होने से इसका महत्व बहुत अधिक बढ़ गया है।
भोपाल [ महा मीडिया] 10 अगस्त 2026 को सावन मास के कृष्ण पक्ष का सोम प्रदोष व्रत है। सावन महीने में सोमवार के दिन प्रदोष व्रत होने से इसका महत्व बहुत अधिक बढ़ गया है।
भोपाल [ महा मीडिया] कामिका एकादशी का व्रत 9 अगस्त 2026 को रखा जाएगा। पंचांग के अनुसार हर वर्ष सावन माह में कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को यह व्रत किया जाता है। इस दिन व्रत रखने वालों को वाजपेय यज्ञ (शक्ति और समृद्धि प्रदान करने वाला अनुष्ठान) का फल मिलता है। कई लोग ऐसे भी होते हैं जो एकादशी के दिन व्रत लेने में समर्थ नहीं होते। ऐसे लोगों को कामिका एकादशी के शुभ दिन पर नीचे दिए गए मंत्रों का जप करना चाहिए। इन मंत्रों का जप करने से भी आपको विष्णु भगवान की कृपा प्राप्त होती है और आपके जीवन की सभी बाधाएं दूर हो सकती हैं। सावन महीने की पहली एकादशी 9 अगस्त को है। इसे कामिका एकादशी कहते हैं। । एकादशी तिथि 8 अगस्त को दोपहर 01:59 बजे शुरू होकर 9 अगस्त को सुबह 11:04 बजे समाप्त होगी। व्रत का पारण 10 अगस्त 2026 को सुबह 05:47 बजे से 08:01 बजे के बीच किया जाएगा।
भोपाल [ महा मीडिया] गुरु पूर्णिमा आषाढ़ मास में आती है। वैसे तो पूर्णिमा प्रत्येक महीने होती है, किंतु आषाढ़ की पूर्णिमा विशेष महत्व रखती है, क्योंकि उस दिन भारत में गुरुपूर्णिमा मनाई जाती है। उस दिन चन्द्रमा बादलों से घिरा रहता है और यह काव्यात्मक घटना है। गुरु में ऐसी अथाह करुणा होती है कि वह अपने शिष्यों के पूरे अंधेरे को पी जाता है और बदले में उन्हें अपना शीतल उजाला देता है। व्यास पूजा, अर्थात गुरु पूर्णिमा शिष्यों और साधकों के जीवन में एक दिव्य तिथि होती है। यह दिन हमें स्मरण कराता है कि क्या हमने सच्चे शिष्य होने का धर्म निभाया? क्या हमने अपने श्रीगुरु के वचनों का पालन किया, उनके ज्ञान को अपने जीवन में उतारा? यह पर्व आत्म-परीक्षण का अवसर देता है। एक सच्चा साधक जानता है कि जीवन मात्र भौतिक सुखों को इकट्ठा करने के लिए नहीं है। यह जीवन धर्म को समझने, उसे जीने और फिर धर्मपूर्वक अर्जित धन से संसार का संचालन करने के लिए मिला है। विवेक और वैराग्य के जागरण के लिए मिला है। गृहस्थ जीवन जीते हुए भी साधक सजग रह सकता है। विवाह करें, परिवार बनाएँ, पर स्मरण रहे कि शरीर और उससे जुड़े सुख नश्वर हैं। इसलिए भोग में लिप्त होकर चेतना को गिरने न दें। विशेषकर गृहस्थ के लिए यह जागरूकता अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि वह रोज संसार, बाजार और भोगवाद से घिरा होता है। वहीं यदि साधना प्रबल हो, तो वही गृहस्थ उत्तम साधक बन जाता है। एक शिष्य वही है, जो साधना करता है। चाहे वह कितना भी व्यस्त हो, उसके अंदर एक आनंद, साधना की महक, सुख बना रहता है। जो प्रात:काल ध्यान करे और सायंकाल जप, वह अपने जीवन की दिशा को सार्थक करता है। जो कभी ध्यान, प्राणायाम और सिमरन न करे, ऐसा व्यक्ति गुरु-शिष्य परंपरा का अंग नहीं हो सकता। जब शिष्य ही न रहे, तो गुरु की उपस्थिति का क्या अर्थ? संपूर्ण सृष्टि के प्रथम गुरु महादेव हैं। ज्ञान की यह परंपरा महादेव से चली और ऋषि वेदव्यास तक पहुँची। वेदव्यास ने वेदों को चार भागों में संहिताबद्ध किया, ब्रह्मसूत्र की रचना की, श्रीमद्भग्वद्गीता का भाष्य किया और वेदांत के प्रति श्रद्धा जगाई। संपूर्ण भारत में भ्रमण कर उन्होंने ऋषियों व आचार्यों को तैयार किया और उन्हें निर्देश दिया कि अपने-अपने क्षेत्रों में वह ज्ञान की धारा फैलाएँ। इसलिए गुरु पूर्णिमा, ऋषि वेदव्यास को समर्पित है। इस दिन हम उनको और समस्त ऋषियों-मुनियों, ऋषिकाओं, योगियों और योगिनियों को स्मरण करते हैं। हम उनके प्रति कृतज्ञता प्रकट करते हैं और याचना करते हैं कि हम भी उनके पदचिह्नों पर चल सकें। यह तभी संभव है जब शिष्य समर्पित भाव-दशा में हो। वह गुरु के प्रति झुका हुआ, अनुग्रह से लबालब हो, क्योंकि यह प्रेम का आदान-प्रदान है, बुद्धि का नहीं। गुरु से कोई कुतर्क नहीं किया जाता। शिष्यत्व ऐसी बात है, जो आप जीवन भर कर सकते हैं। शिष्य न मात्र आध्यात्मिक अर्थों में बनना है, वरन जीवन के प्रत्येक कदम पर हमें कुछ न कुछ सीखते रहना है। अनंत लोग भरे पड़े हैं, अनंत घटनाएँ घट रही हैं। आप सजग रहें और आपमें अहंकार की अकड़ न हो, तो बहुत कुछ सीख सकते हैं, सिखाने वाला छोटा बच्चा भी हो सकता है, कोई चींटी हो सकती है या कोई शिक्षक। हर घटना कुछ न कुछ सिखा सकती है, किंतु उसके लिए शिष्य होना आवश्यक है और वह बड़ी कठिन बात है। मनुष्य को सीखने के लिए जो विनम्रता, चित्त की सरलता चाहिए, जो सीखने को तैयार है, उसे अपनी अस्मिता और अहंकार को छोड़ देना पड़ता है, क्योंकि अहंकार सीखने न देगा। अहंकार आपको बदलने न देगा। अहंकार अपने से ऊपर किसी को रखने को कभी राजी ही नहीं है। सीखने को वह तैयार है, जिसने यह अनुभव कर लिया है कि अब तक अपने आप अनेक उपाय किए, पर कुछ भी सीख न पाया। सीखने को वही तैयार है, जिसने देख लिया अपने हृदय के गहन अंधकार को। जिसने देख लिया कि मैं अपने जीवन को मात्र उलझा रहा हूँ, सुलझा नहीं रहा, बल्कि जितना सुलझाने की प्रयास करता हूँ, बात और उलझती चली जाती है। ऐसे पीड़ा के क्षणों में, ऐसी संताप की अवस्था में अपनी परिस्थिति को पूरा-पूरा देखकर शिष्यत्व का जन्म होता है। गुरु तो सदैव उपस्थित है, सीखने वाले नहीं होते। 'भारत में बड़ी पुरानी लोकोक्ति है कि जब सतयुग था, तब गुरु की इतनी आवश्यकता न थी, किंतु कलियुग में गुरु की बड़ी आवश्यकता होगी। आखिर इसका क्या कारण है!... हम किस अनुसार से बाँटते हैं संसार को? सतयुग कहते हैं उस समय को, जब लोग बड़े सचेत थे, सावधान थे। और कलियुग कहते हैं उस युग को, जब लोग बड़े सोए हुए हैं, मूर्छित हैं।' अत: स्वयं को चेतनावान बनने के लिए परमपूज्य महर्षि महेश योगी जी ने भावातीत ध्यान योग को प्रतिपादित किया। भावातीत ध्यान योग का नियमित रूप से प्रतिदिन प्रात: एवं संध्या के समय 15 से 20 मिनट का अभ्यास आपकी मूर्छा का हरण कर आपको चेतनावान बनाने का प्रयास रहित माध्यम है।
।।जय गुरूदेव जय महर्षि।।
[ ब्रह्मचारी गिरीश जी - संपादकीय ]
भोपाल [ महामीडिया] एक सुंदर जापानी कहानी है। एक आदमी चट्टानों को तराशने का कार्य करता था। वह कड़ा परिश्रम करता, किंतु कमाई कुछ विशेष नहीं होती। वह असंतुष्ट रहता था। वह आहें भरा करता। एक बार वह चिल्लाकर बोला, 'काश! मैं इतना धनवान होता कि रेशमी गद्दों पर आराम करता।' स्वर्ग से एक देवदूत आया और बोला, 'तुमने जो कहा, तुम वही हो।' वह आदमी धनवान हो गया, उसने रेशम के गद्दे पर स्वयं को बैठा हुआ पाया। तभी वहाँ से उस देश का राजा निकला। उसके रथ के आगे और पीछे घुड़सवार चल रहे थे और सिर के ऊपर सोने का छत्र लगा हुआ था। जब उस धनवान ने यह दृश्य देखा, तो वह अपनी स्थिति से असंतुष्ट हो गया। आहें भरते हुए चिल्लाया, 'मैं राजा बनना चाहता हूँ।' देवदूत फिर आया और बोला, 'तुमने जो कहा, तुम वही हो।' अचानक उस धनवान ने स्वयं को रथ पर पाया। उसके आगे घुड़सवार चल रहे थे, पीछे घुड़सवार चल रहे थे और ऊपर छत्र लगा हुआ था। उस दिन सूरज तमतमाता हुआ धरती को ऐसे झुलसा रहा था कि जैसे सब कुछ स्वाहा हो जाएगा। राजा को शिकायत हुई कि सूरज की शक्ति उससे अधिक है। वह असंतुष्ट हो गया। वह चिल्लाया, 'मैं सूरज होना चाहता हूँ।' देवदूत आया और कहा, 'तुमने जो कहा, तुम वही हो।' राजा सूरज बन गया। उसने धरती की सारी खर-पतवार जला दी और पृथ्वी के समस्त राजाओं के काफिलों को झुलसा दिया। फिर एक बादल आया और उसके व पृथ्वी के बीच अड़ गया। इस प्रकार वह बादल बन गया। बादल ने धरती पर मोटी-मोटी बूँदें बरसाईं, जिनसे नदियों में बाढ़ आ गई, घर बह गए, खेत नष्ट हो गए। उसकी बूँदें एक चट्टान पर गिरीं, जो टस से मस न हुई। बादल क्रोधित हो गया, क्योंकि चट्टान उसकी शक्ति के सामने झुक नहीं रही थी। वह चिल्लाया, 'मैं चट्टान होना चाहता हूँ।' देवदूत ने चट्टान बना दिया। तभी एक आदमी छैनी व हथौड़ी लिए हुए आया और चट्टान को तराशने लगा। चट्टान ने सोचा कि इस आदमी के पास इतनी शक्ति कैसे है, जो मेरी छाती से पत्थर तराश रहा और वह असंतुष्ट हो गया। वह चिल्लाया, 'मैं कमजोर हूँ। मैं आदमी बनना चाहता हूँ।' देवदूत ने फिर से उसे संगतराश बना दिया। अब भी वह कड़ा परिश्रम करता और थोड़ी सी कमाई होती, मगर उसी में संतुष्ट था। संतोष का अर्थ उस सबके प्रति बोध से भरना है, जो तुम्हारे पास है। यदि तुम्हें एक झलक भी मिल जाए कि कितना कुछ तुम्हें मिला हुआ है, तो क्या तुम्हारी अपेक्षा रह जाएगी? अधिक की अपेक्षा करना मात्र अनुग्रह की कमी है। यदि तुम पूरे परिप्रेक्ष्य को देख पाओ, तो जो तुम्हें मिला है, उसके प्रति अहोभाव से भर जाओगे। जब हम चर्चा करते हैं कि परिवर्तन कैसे लाया जाए, तो उस परिवर्तन से हमारा तात्पर्य सामान्यत: सतही परिवर्तन से होता है। दृढ़ निश्चय, निष्कर्ष, विश्वास, नियंत्रण और झिझक के द्वारा हम उस सतही लक्ष्य तक पहुँचने के लिए संघर्ष करते हैं, जिसे चाहते हैं; जिसके लिए हम लालायित हैं। हम यह उम्मीद लगाते हैं कि उस तक पहुँचने में अचेतन मन, हमारे मन के गहरे स्तर तक हमारी सहायता करेंगे। हमें लगता है कि यह आवश्यक है कि हम उन गहरे स्तरों को अनावृत्त करें, परंतु सतही स्तरों और तथाकथित गहरे स्तरों के बीच एक शाश्वत द्वंद्व है। मनोवैज्ञानिक इससे भली-भाँति परिचित हैं। क्या यह परिवर्तन लाएगा? क्या यह हमारे दैनिक जीवन का सर्वाधिक मूलभूत और महत्वपूर्ण प्रश्न नहीं है कि कैसे अपने आप में एक आमूल परिवर्तन लाया जाए? क्या सतही स्तर पर कुछ बदलाव वह परिवर्तन ला सकेंगे? क्या चेतना के 'मैं' के विभिन्न स्तरों को समझना; अतीत अर्थात् बचपन से आज तक के विभिन्न व्यक्तिगत अनुभवों को अनावृत्त करना; अपने माता-पिता, पूर्वजों व प्रजाति के सामूहिक अनुभवों का स्वयं में निरीक्षण करना; उस समाज विशेष की संस्कारबद्धता का अनुसंधान करना, जिसमें हम रहते हैं, क्या यह सब विश्लेषण ऐसा परिवर्तन ला पाएगा, जो छिटपुट सामंजस्य बिठाना भर न हो? मैं यह महसूस करता हूँ और निस्संदेह आपको भी यह महसूस होता होगा कि व्यक्ति के जीवन में परिवर्तन आवश्यक है। एक ऐसा परिवर्तन, जो प्रतिक्रिया मात्र नहीं है, जो परिवेश की माँगों के दबाव और तनाव का परिणाम नहीं है। ऐसा परिवर्तन कैसे लाया जाए? चेतना मानव जाति के अनुभव का योग तो है ही, उसमें वर्तमान से अपना विशिष्ट संपर्क भी जुड़ा है; क्या वह चेतना परिवर्तन ला सकती है? क्या अपनी चेतना व गतिविधियों का मेरा अध्ययन मन को यूँ स्थिर कर सकता है, जिससे वह बिना निंदा के निरीक्षण कर सके? परमपूज्य महर्षि महेश योगी जी द्वारा प्रतिपादित भावातीत ध्यान का प्रात: एवं संध्या के समय 15 से 20 मिनट नियमित अभ्यास से स्वयं में स्थित होकर जब हम स्वयं का अवलोकन करते हैं तो हम पाते हैं कि प्रत्येक परिवर्तन जब प्रकृति के नियमों के अनुकूल होता है तो वह हमें भीतर एवं बाहर से जोड़ता है एक अनुकूलनशीलता का अनुभव होता है जो हमें परिवर्तनों के प्रति सकारात्मक दृष्टि देता है तो हमें उत्तरोत्तर प्रसन्नता का अनुभव होता है क्योंकि जीवन संघर्ष नहीं आनंद है।
।।जय गुरूदेव जय महर्षि।।
[ ब्रह्मचारी गिरीश जी - संपादकीय]
भोपाल [महामीडिया] ईश्वर की सृष्टि में कुछ भी अमंगल नहीं होता, यहाँ जो होता है, मंगल ही होता है। यहाँ जन्म भी मंगल है तो मृत्यु भी मंगल है। बस हमें अपने दृष्टिकोण को बदलना होता है। जो जीवित हैं वो किसी और दृष्टिकोण से मृत्यु को देख रहे हैं और जो मृत हैं उनका दृष्टिकोण कुछ और है। जो जीवित हैं वो दु:खी हो जाते हैं, किंतु मरने वाला तो उत्सव में है, क्योंकि वो मरा ही नहीं। यर्थात में हम मरते नहीं हैं। हम शरीर नहीं आत्मा हैं और आत्मा को न जन्म छूता है न मृत्यु। आत्मा तो हर पल आनंद की अवस्था में रहती है। मरता तो ये शरीर है और हम शरीर नहीं। यदि हम शरीर होते तो मरने के बाद घर वाले अंतिम संस्कार न करते। फिर जो हम हैं वो मरने के बाद भी ज्यों के त्यों हैं। जीवन के इस रहस्य को जान कर अमर हो जाते हैं जिससे अंदर से मरने का भय निकल जाता है। ये मृत्यु का भय ही है, जो सभी को दु:खी करता रहता है। जैसे ही हम इस भय से पार पा जाते हैं, उसी क्षण आनंद में आ जाते हैं। अपने मन की चिंता, भय, आत्मग्लानि व संकोच जैसी सभी नकारात्मक भावनाओं तथा काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद व मत्सर जैसी हानिकारक आदतों को पहचान कर उनमें से मुक्ति के उपाय। स्वयं के जीवन को सुशोभित करने वाले उत्सव, करुणा व सत्य जैसे अति सुंदर भावों को आप जब चाहें, अपने मन में जागृत कर सकते हैं। न जीवन में कोई अवकाश होता है। पूरे जीवन में कोई ऐसा क्षण नहीं आता जब वह ठहरता हो, विश्राम करता हो। इन दिनों हम कार्य के पीछे पागल, जिस अफरा-तफरी के साथ जीने के आदी हो गए हैं, उसने सारी दुनिया को 'मैडहाउस' बना दिया है। सब भागे जा रहे हैं। पता किसी को कि कहाँ जाना है? क्या पाना है? जितना मिलता है उतना ही कम लगता है। एक पड़ाव से दूसरा पड़ाव। लक्ष्य का कोई ठिकाना नहीं। सब चिल्ला रहे हैं शीघ्र चलो। किंतु कहाँ? क्या पाने की इच्छा है? नहीं जानते। क्या होगा इस सब का परिणाम? इतना समय भी नहीं कि इसके बारे में सोचें। सोचेंगे तो देरी हो जाएगी, बगल वाला आगे निकल जाएगा। इस भाग-दौड़ में सारे संबंध भी पीछे छूटते जा रहे हैं, यहाँ तक कि परमात्मा को भी हृदय से ही नहीं आँखों से भी ओझल कर दिया है। ऐसे ही लोगों ने जिनके लिए काम ही सब कुछ है, जीवन को अस्त-व्यस्त कर दिया है। इससे जीवन की प्रसन्नता और शांति को वनवास हो गया है। जीवन से उत्सव के क्षण छिन गए हैं। उत्सव के स्थान पर मनोरंजन आता जा रहा है, जो कि क्षणिक तौर पर बनावटी प्रसन्नता देता है। उत्सव में हम स्वयं सम्मिलित होते हैं, मनोरंजन में मात्र दूसरे को देखते हैं। मनोरंजन पैसिव है, उत्सव स्वयं में ही बहुत एक्टिव है। उत्सव का मतलब है, हम नाच रहे हैं। प्रसन्नता हमारे अंदर से बाहर निकल रही है। मनोरंजन में कोई नाच रहा है, उसे नाचते थिरकते देख रहे हैं किंतु कहाँ स्वयं अपनों के साथ नाचने-थिरकने का आनंद और कहाँ किसी को नाचते हुए देखना। अपने जीवन को स्थिरता प्रदान करें। अपने विचारों को सुदृढ़ करें। स्वयं को तराशने का कार्य करें। इस हेतु परम पूज्य महर्षि महेश योगी जी द्वारा प्रतिपादित भावातीत ध्यान योग शैली का प्रतिदिन प्रात: एवं संध्या को 15 मीनट का अभ्यास आपके जीवन को आनंद से भर देगा।
।।जय गुरूदेव जय महर्षि।।
[ब्रह्मचारी गिरीश जी]