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आज माता कुष्मांडा की पूजा
भोपाल (महामीडिया ) आज चैत्र नवरात्रि पर्व का चतुर्थ दिवस है। यह दिवस माता कुष्मांडा को समर्पित है इसलिए इस दिन विधि विधान पूर्वक माता कुष्मांडा की पूजा की जाती है।
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भोपाल (महामीडिया ) आज चैत्र नवरात्रि पर्व का चतुर्थ दिवस है। यह दिवस माता कुष्मांडा को समर्पित है इसलिए इस दिन विधि विधान पूर्वक माता कुष्मांडा की पूजा की जाती है।
धर्म
भोपाल [महामीडिया] ईश्वर की सृष्टि में कुछ भी अमंगल नहीं होता, यहाँ जो होता है, मंगल ही होता है। यहाँ जन्म भी मंगल है तो मृत्यु भी मंगल है। बस हमें अपने दृष्टिकोण को बदलना होता है। जो जीवित हैं वो किसी और दृष्टिकोण से मृत्यु को देख रहे हैं और जो मृत हैं उनका दृष्टिकोण कुछ और है। जो जीवित हैं वो दु:खी हो जाते हैं, किंतु मरने वाला तो उत्सव में है, क्योंकि वो मरा ही नहीं। यर्थात में हम मरते नहीं हैं। हम शरीर नहीं आत्मा हैं और आत्मा को न जन्म छूता है न मृत्यु। आत्मा तो हर पल आनंद की अवस्था में रहती है। मरता तो ये शरीर है और हम शरीर नहीं। यदि हम शरीर होते तो मरने के बाद घर वाले अंतिम संस्कार न करते। फिर जो हम हैं वो मरने के बाद भी ज्यों के त्यों हैं। जीवन के इस रहस्य को जान कर अमर हो जाते हैं जिससे अंदर से मरने का भय निकल जाता है। ये मृत्यु का भय ही है, जो सभी को दु:खी करता रहता है। जैसे ही हम इस भय से पार पा जाते हैं, उसी क्षण आनंद में आ जाते हैं। अपने मन की चिंता, भय, आत्मग्लानि व संकोच जैसी सभी नकारात्मक भावनाओं तथा काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद व मत्सर जैसी हानिकारक आदतों को पहचान कर उनमें से मुक्ति के उपाय। स्वयं के जीवन को सुशोभित करने वाले उत्सव, करुणा व सत्य जैसे अति सुंदर भावों को आप जब चाहें, अपने मन में जागृत कर सकते हैं। न जीवन में कोई अवकाश होता है। पूरे जीवन में कोई ऐसा क्षण नहीं आता जब वह ठहरता हो, विश्राम करता हो। इन दिनों हम कार्य के पीछे पागल, जिस अफरा-तफरी के साथ जीने के आदी हो गए हैं, उसने सारी दुनिया को 'मैडहाउस' बना दिया है। सब भागे जा रहे हैं। पता किसी को कि कहाँ जाना है? क्या पाना है? जितना मिलता है उतना ही कम लगता है। एक पड़ाव से दूसरा पड़ाव। लक्ष्य का कोई ठिकाना नहीं। सब चिल्ला रहे हैं शीघ्र चलो। किंतु कहाँ? क्या पाने की इच्छा है? नहीं जानते। क्या होगा इस सब का परिणाम? इतना समय भी नहीं कि इसके बारे में सोचें। सोचेंगे तो देरी हो जाएगी, बगल वाला आगे निकल जाएगा। इस भाग-दौड़ में सारे संबंध भी पीछे छूटते जा रहे हैं, यहाँ तक कि परमात्मा को भी हृदय से ही नहीं आँखों से भी ओझल कर दिया है। ऐसे ही लोगों ने जिनके लिए काम ही सब कुछ है, जीवन को अस्त-व्यस्त कर दिया है। इससे जीवन की प्रसन्नता और शांति को वनवास हो गया है। जीवन से उत्सव के क्षण छिन गए हैं। उत्सव के स्थान पर मनोरंजन आता जा रहा है, जो कि क्षणिक तौर पर बनावटी प्रसन्नता देता है। उत्सव में हम स्वयं सम्मिलित होते हैं, मनोरंजन में मात्र दूसरे को देखते हैं। मनोरंजन पैसिव है, उत्सव स्वयं में ही बहुत एक्टिव है। उत्सव का मतलब है, हम नाच रहे हैं। प्रसन्नता हमारे अंदर से बाहर निकल रही है। मनोरंजन में कोई नाच रहा है, उसे नाचते थिरकते देख रहे हैं किंतु कहाँ स्वयं अपनों के साथ नाचने-थिरकने का आनंद और कहाँ किसी को नाचते हुए देखना। अपने जीवन को स्थिरता प्रदान करें। अपने विचारों को सुदृढ़ करें। स्वयं को तराशने का कार्य करें। इस हेतु परम पूज्य महर्षि महेश योगी जी द्वारा प्रतिपादित भावातीत ध्यान योग शैली का प्रतिदिन प्रात: एवं संध्या को 15 मीनट का अभ्यास आपके जीवन को आनंद से भर देगा।
।।जय गुरूदेव जय महर्षि।।
[ब्रह्मचारी गिरीश जी]
भोपाल [महामीडिया] हम प्रेरित होकर नवीन कार्य नहीं करते, कुछ नया करके ही प्रेरित होते हैं। प्रतिदिन अभ्यास करना, बिना यह सोचे कि आज का परिणाम क्या होगा ? सबसे सच्चा नियम है जिसे हम 'रचनात्मकता' कहते हैं। जब आप नित्य अभ्यास को अपना लक्ष्य बनाते हैं, तो परिणाम स्वयं बनकर निकलता है। प्राय: हम यह सोचते हैं कि प्रेरणा पहले आएगी और फिर कार्य होगा; पर मूलत: उलट है। हम कुछ नवीन कार्य करके ही प्रेरित होते हैं। प्रतिदिन कुछ नया करने का निर्णय लें। इस प्रक्रिया को महत्व दें और जानें कि आपका यह नियम ही एक नए कौशल को जन्म दे सकता है। साहस वह है, जो सच्चाई के समीप ले जाए। कमजोरी, डर नहीं है, यह वह साहस है जो हमें इंसान बनाता है। जब हम यह स्वीकार करते हैं कि हम पूर्ण नहीं हैं, तब हम दूसरों के प्रति अधिक दयालु बनते हैं। जो व्यक्ति खुलकर कहता है- 'मुझे नहीं पता', या 'मैं गलत था', वही बहादुर है। सच्चा साहस वही है जो हमें सच्चाई के समीप लाता है। दुनिया को उन लोगों की आवश्यकता नहीं है, जो पूर्ण हैं परंतु उन लोगों की आवश्यकता अधिक है, जो सहज और सच्चे हैं। सुखी और स्वस्थ भविष्य के लिए क्या विकल्प चुनें? अगर आपको अभी एक ऐसा विकल्प चुनना हो जिससे आपका भविष्य स्वस्थ और सुखी बने तो आप प्रत्येक महीने क्या करेंगे? बचत बढ़ाएँगे? अपना कार्यस्थल बदलेंगे? यात्रा करेंगे? या स्वयं पर कार्य करेंगे। जीवन बहुत छोटा है; यहाँ मात्र स्वयं पर कार्य करने का समय है, वह भी कम है। लोगों को अपने अनुसार बनाने का प्रयास न करें। आपके बच्चे उस कार्य में सम्मिलित नहीं होना चाहते जो आपने तय किया था, 'कोई बात नहीं'। बहुत समय और ऊर्जा ऐसे लोगों से की गई उम्मीद करने में नष्ट होती है, जो आपके अनुसार नहीं चलना चाहते। कोई आपकी आवश्यकता के अनुसार नहीं दिख रहा, तो उसे परिवर्तित करने का प्रयास न करें। आप निश्चित करें कि आपको आगे क्या करना है? सफलता कभी पैसों से नहीं आँकी जा सकती। असली सफलता यह है कि स्वयं लोगों को प्रेरित करें एवं नया सोचें। अगर हम अपने कमरे की दीवार पर किसी स्थान या कार्य का चित्र लगाते हैं और यह सोचते हैं कि वह एक दिन वहाँ जायेंगे या वह कार्य करेंगे तो यही हमारी सबसे बड़ी उपलब्धि है। जब कभी हम सब से पूछा जाता है कि इतना बड़ा संकट क्यों उठा रहे हो। हमारा उत्तर सरल होना चाहिए... सबसे बड़ा संकट तो कुछ नया न करना है। अगर आप गल्तियाँ करने से डरते हैं, तो कुछ बड़ा नहीं कर सकते। हमने असफलताएँ देखी हैं, किंतु हर असफलता एक सबक लेकर आती है। असफलता कष्ट देती है, किंतु वही कष्ट आपको सुदृढ़ बनाता है। अगर सब कुछ सरल होता, तो कोई परिवर्तन नहीं होता। संकट उठाएँ, प्रश्न पूछें और कभी मत मानें कि आप किसी बड़े कार्य के लिए छोटे हैं। प्रत्येक परिवर्तन का प्रारंभ ऐसे व्यक्ति से हुआ, जिसने कहा कि मैं प्रयास करूँगा। अगर आप यह कहने का साहस रखते हैं, तो भविष्य आपका है। परम पूज्य महर्षि महेश योगी जी सदैव ही प्रत्येक दिन का शुभारंभ ''भावातीत ध्यान-योग'' के अभ्यास करने को प्रेरित करते थे क्योंकि प्रतिदिन प्रात: एवं संध्या के समय 10 से 15 मिनट का ध्यान हमारे जीवन में आनंद, उत्साह एवं अतुलनीय साहस का संचार करता है, जो हमारे जीवन को आनंदमय बनाता है।
।।जय गुरूदेव जय महर्षि।।
[ब्रह्मचारी गिरीश जी]
भोपाल [महामीडिया] सच्चे साधु-संत भिक्षा मांगकर अपना जीवन यापन करते हैं क्योंकि अहंकार और मोह माया को त्यागने का एक आध्यात्मिक साधन है। ''भिक्षाटन'' उन्हें सादा और संतुष्ट जीवन जीने, समाज से जुड़ाव बनाये रखने और व्यक्ति इच्छाओं से मुक्ति पाने में सहायता करता है। भिक्षा माँगने कि यह प्रक्रिया एक सामान्य भीख माँगने से अलग है। क्योंकि उद्देश्य आत्म साधना और आध्यात्मिक विकास है। एक नगर में एक संत भिक्षाटन पर नियमित रूप से जाते थे। एक माता जब भी संत के कमंडल में कुछ भोज्य पदार्थ देती तो वह सदैव संत जी से प्रवचन कहने को कहती थी परंतु वह संत सदैव उन्हें 'सौभाग्यवती' रहने का आशीर्वाद दे देते थे। कुछ समय पश्चात माता बहुत क्रोध में बोली संत महाराज में नियमित रूप से आपको यथासंभव स्वादिष्ट भोज्य पदार्थ देती हूँ और प्रवचन का आग्रह करती हूँ किंतु आप ऐसे ही चले जाते हैं। अगले दिन माता ने स्वादिष्ट खीर बनाई और भिक्षाटन पर आए संत ने जब अपना कमंडल आगे बढ़ाया तो माता ने खीर को संत के कमंडल में डालने से मना कर दिया और कहा संत महाराज आपके कमंडल में गोबर चिपका हुआ है यदि मैं इसमें स्वादिष्ट खीर डालूँगी तो यह खीर स्वादहीन व गोबर की दुर्गंध से मलिन हो जाएगी अत: आप अपने पात्र को स्वच्छ कर लें जिससे में आपको स्वादिष्ट व सुगंधित खीर दे सकूं। इस पर संत बोले माता कल आप मुझ पर क्रोधित हो रही थी कि आप मुझे कभी-भी अपने प्रवचन नहीं सुनाते माता मैं भी चाहता हूँ कि आप अपने भीतर की मलिनता का नाश कर लैं तो, मैं आपको प्रवचन सुना पाऊँगा अन्यथा उन प्रवचनों को सुनने का आप पर कुछ भी सकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ेगा। माता, संत जी की बात समझ गई और उन्होंने संत जी से स्वयं को भीतर से शुद्ध व पवित्र करने का प्रयास करने का वचन दिया। हम सभी यही गलती करते हैं। बाहरी आवरण को स्वच्छ रखते हैं परंतु भीतर की मलिनता पर कोई ध्यान नहीं देते। देवी लक्ष्मी का कृपापात्र सुपात्र कौन है और कुपात्र कोन है? महाभारत के अनुशासन पर्व के ग्यारहवें अध्याय की एक कथा में स्वयं माता लक्ष्मी ने परिभाषित किया है भारतीय वांग्मय में यह कथा लक्ष्मी-रुक्मिणी संवाद के रूप में विख्यात है। वह कहती हैं- मैं ऐसे व्यक्ति में निवास करती हूँ जो निर्भीक, कार्यकुशल, कर्मपरायण, क्रोधरहित, देव आराधना को तत्पर, कृतज्ञ, जितेन्द्रिय तथा सत्वगुण से भरा हो, सेवाभावी हो, क्षमाशील हो समय व ज्ञान को जो मान दे, जो सोम्य हो, सत्य कहता हो, मन-क्रम-वचन से पवित्र हो।
देवी लक्ष्मी ने रुक्मिणी से कहा, 'जो स्वभावत: स्वधर्मपरायण, धर्मज्ञ, बड़े-बूढ़ों की सेवा में तत्पर, मन को वश में रखने वाले, क्षमाशील तथा सामर्थ्यशाली हैं, ऐसे लोगों में मैं निवास करती हूँ।
आशय है कि... लक्ष्मी कर्म से अवश्य प्राप्त होती है, किंतु टिकती आचरण से है। लक्ष्मीवान होने के लिए मन सहित इंद्रियों को नियंत्रित रखना आवश्यक है। इन्हें साधने वाला ही बलवान और सामर्थ्यवान होकर लक्ष्मी का अर्जन कर पाता है। सबसे महत्वपूर्ण है मन का भाव। मन मैला न रखें।
लक्ष्मी कहती हैं, 'जो अपने समय को कभी व्यर्थ नहीं जाने देते, जिन्हें तपस्या एवं ज्ञान प्रिय है, ऐसे लोगों में मैं निवास करती हूँ। किंतु जिसका मन मूढ़ता से भरा है, ऐसे व्यक्ति में मैं नित्य निवास नहीं करती हूँ।'
लक्ष्मी का वचन है, 'जो स्त्रियां सत्यवादिनी, सौम्य, सौभाग्यशालिनी, पतिव्रता, कल्याणमय आचार-विचार वाली तथा सदैव वस्त्राभूषण से विभूषित रहती हैं, मैं ऐसी स्त्रियों में निवास करती हूँ। इसके उलट जो निर्दयी, धैर्यहीन, सदैव सोने वाली हों, उन्हें मैं त्याग देती हूँ।' लक्ष्मीकृपा के लिए दूसरों के प्रति दया और पवित्रता परम आवश्यक है, फिर चाहे वो स्त्री हो या पुरुष।
जो समाज अपने आसपास के वातावरण तथा जलस्रोतों के प्रति दायित्ववान होता है, उन्हें पवित्र तथा समृद्ध रखता है, लक्ष्मी उसी को अपना प्रसाद प्रदान करती हैं। ज्ञानियों और गुणियों की अधिकाधिक संख्या समाज की प्रगति, उन्नति और लक्ष्मी का ही प्रतीक है।
सार... असल लक्ष्मी तो प्रकृति है। इसके तत्वों का संरक्षक ही वास्तविक धनवान है।
हमें क्या चाहिए वह जो हमें तात्कालिक सुख दे रहा है या वह जो अंतत: आत्मा को उन्नति की ओर ले जाये। परमपूज्य महर्षि महेश योगी जी सदैव कहा करते थे कि साधु बनने के लिए हिमालय जाने की कोई आवश्यकता नहीं है। प्रत्येक मनुष्य अपने घर में रहते हुए साधु बन सकता है। संयमित और आत्माभिमुख जीवन जीते हुए।
साधु मात्र बाहरी रूप धारण करने से नहीं होगा। साधुता आंतरिक गुण है। जिसका मूल है सर्वात्मक संयम। संयम का अर्थ है। अपनी इंद्रियों, विचारों और वचनों को नियंत्रित करते हुए जीवन यापन करना। इस हेतु महर्षि सदैव भावातीत ध्यान योग शैली का नियमित रूप से प्रात: एवं संध्या के समय 15-20 मिनट का अभ्यास कर आप संयमित एवं आत्माभिमुख जीवन यापन कर सकते हैं। ।।जय गुरूदेव जय महर्षि।।
[ ब्रह्मचारी गिरीश जी ]