चुनाव आयोग को जबरन कठघरे में खड़ा करना उचित नहीं

भोपाल [ महा मीडिया] भारत में लोकतंत्र की सबसे बड़ी कसौटी स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव हैं और इस कसौटी का पहरेदार है चुनाव आयोग। हाल के दिनों में चुनाव आयोग को लेकर उठे सवालों ने एक बार फिर इस संवैधानिक संस्था की भूमिका को चर्चा के केंद्र में ला दिया है।

पिछले दिनों चुनाव आयोग द्वारा की गई प्रेस कॉन्फ्रेंस इसी संदर्भ में महत्वपूर्ण थी। आयोग ने स्पष्ट रूप से कहा कि वह किसी भी राजनीतिक दबाव में काम नहीं करता और हर चुनाव को पूरी पारदर्शिता और निष्पक्षता के साथ कराना उसकी संवैधानिक जिम्मेदारी है। आयोग ने EVM की विश्वसनीयता, मतदाता सूची में सुधार और चुनावी हिंसा को रोकने के लिए उठाए गए कदमों का ब्यौरा भी दिया। आयोग का कहना था कि "मुक्त चुनाव" का अर्थ केवल वोट डालने की आजादी नहीं, बल्कि बिना डर और बिना प्रलोभन के वोट डालने की व्यवस्था सुनिश्चित करना है।

दूसरी ओर, विपक्ष द्वारा चुनाव आयोग के कार्यालय के बाहर और देश के कई हिस्सों में किया गया प्रदर्शन भी लोकतंत्र का ही हिस्सा है। विपक्ष का आरोप है कि संस्थाओं पर कार्यपालिका का दबाव बढ़ा है और समान अवसर (level playing field) की भावना कमजोर हो रही है। लोकतंत्र में विपक्ष का कर्तव्य है कि वह सत्ता और संस्थाओं से सवाल पूछे लेकिन यहाँ एक महीन रेखा है। सवाल पूछना लोकतांत्रिक अधिकार है, परंतु "जबरन प्रदर्शन" और संस्थाओं की विश्वसनीयता को बिना ठोस सबूत के सार्वजनिक रूप से ध्वस्त करने का प्रयास, मतदाता के मन में ही अविश्वास पैदा करता है। जब मतदाता को ही लगने लगे कि उसका वोट सुरक्षित नहीं है, तो लोकतंत्र की जड़ें कमजोर होती हैं।

जरूरत इस बात की है कि चुनाव आयोग न केवल निष्पक्ष हो, बल्कि निष्पक्ष दिखे भी। उसे विपक्ष की आशंकाओं को प्रेस कॉन्फ्रेंस तक सीमित न रखकर, जमीन पर ठोस संवाद से दूर करना होगा। वहीं विपक्ष को भी विरोध को अराजकता में बदलने के बजाय, संवैधानिक रास्तों - जैसे अदालत और संसद - के जरिए अपनी बात मजबूती से रखनी होगी।

[ संपादकीय : धर्मेंद्र सिंह ठाकुर]

- धर्मेंद्र सिंह ठाकुर

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